यह कोई साधारण कहानियों की किताब नहीं है। यह की किताब है। इसे 18वीं शताब्दी (लगभग 1740-50 के आसपास) में एक महान सूफी संत, कवि और विद्वान शाह निज़ामुद्दीन औलिया (औरंगाबादी) ने लिखा था। हाँ, दिल्ली वाले हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया से इन्हें भ्रमित न करें – ये उन्हीं के नाम पर एक और बुज़ुर्ग थे, जिनका उर्स (वार्षिक मेला) औरंगाबाद, महाराष्ट्र में लगता है। क्यों लिखी गई यह किताब? शाह निज़ामुद्दीन औलिया (औरंगाबादी) एक बहुत बड़े आशिक़-ए-हक़ीक़ी (सच्चे प्रेमी) थे। उनकी जुबान पर हमेशा ये ज़िक्र रहता था कि इंसान की रूह (आत्मा) अल्लाह से बिछड़ कर इस दुनिया में आई है और उसे वापस अपने मूल स्रोत में मिल जाना है।
शीर्षक: तोहफ़ा-तुल-अवाम: वह किताब जिसने सैकड़ों साल पहले सिखाया "अल्लाह कैसे मिलते हैं" tohfa tul awam in hindi
आइए, इस ब्लॉग पोस्ट में हम इसी रहस्यमयी और मार्मिक किताब की सैर करते हैं। तोहफ़ा-तुल-अवाम शब्दों का अर्थ है "आम लोगों के लिए उपहार" । tohfa tul awam in hindi